‘My World’ is a series of insights on gender issues by the people for the people

Smita Morale is a post graduate in Marathi literature.She is a writer, a painter, a professional cook, an interior designer and an avid reader.



स्त्री का जन्म दुर्भाग्यपूर्ण या भाग्यशाली?

हमारे यहां लडकी को अपने जीवन के लिये गर्भावस्थासेही संघर्ष करना पडता है| गर्भ की जांच करके स्त्री भ्रूण की हत्या की जाती है| इस कुप्रथा के खिलाफ बने कानून ने काफी हद तक इस गंभीर अपराध को रोका है परंतु जो नुकसान पहले हो चुका है उसकी कभी भी भरपाई नही हो सकेगी| पुराने जमाने मे नवजात मादा शिशुओंको जमीन मे गाड दिया जाता था या दूध भरे बर्तन मे डुबो दिया जाता था |माँ बाप के लिये लडकी इक बोझ सी होती थी |लडकी को पालना, शिक्षा देना, दहेज देकर उसकी शादी करना ...शादी के बाद भी ससुरालवालोंकी मांगे पूरी करना ये सारी चीजे आम परिस्थितियों मे उसके परिवार के लिये मुश्किल हो जाती थी | घर मे अगर तीन चार लडकियां पैदा होती तो लडका पाने के लिये दूसरे ब्याह भी रचे जाते थे| सिर्फ लडका पैदा करने की इस विकृत मानसिकता ने लडकी पैदा होने पर बिबी की हत्या करना या उसे तलाक देना भी जायज ठहराया जाता था|

ऐसी कुप्रथाओं के पीछे कई कारण थे| मध्ययुगीन समाजमे परकीय आक्रांताओंद्वारा आक्रमण की स्थिति मे महिलाएं और बच्चे उनकी शिकार हो जाते थे| ऐसी घटनाओं से बचने के लिये लडकियों की कम उम्रमेही शादी की जाती थी, उनपे तरह तरह की पाबंदियां लगाई जाती थी| पती के निधन होने की स्थिति मे उन्हे सती बनने के लिये उद्युक्त किया जाता था क्योंकी पती के निधन के बाद उसकी सामाजिक स्थिति और भी खराब हो जाती थी| भारतीय समाज मे बेवाओंका जीवन सबसे बदतर माना जाता था| इन्ही परिस्थितियों के कारण उसका जन्म उल्हास की जगह दुख से मनाया जाता था | आज जमाना बदल गया है परंतु आज भी लडकियां सुरक्षित नही है | समाज मे पनपी विकृतियां आज और भी भयावह हो गयी है ...छोटी लडकियां भी इन वहशियोंका शिकार बनती है |

रोजगार के लिये अपना गांव, अपना शहर, अपना गृहराज्य छोडके आये हुए लोग हो या अपने परिवार को पीछे छोडकर आये हुए कामगार हो, या शिक्षा के लिये दूर जानेवाले लोग हो धीरे धीरे सबका अपने परिवार से लगाव कम होता जाता है, अपने गांव से संपर्क कम होता जाता है| इसका असर उसकी संवेदना पर भी होता है | अकेले रहने के कारण जिंदगी बिना रोकटोक जीने की आदत पड जाती है| धीरे धीरे अच्छे बुरे की कल्पनाएं भी बदलने लगती है|ऐसी स्थितियों मे गिरती हुई मूल्यव्यवस्थाओंकी शिकार लडकियां और औरते हो जाती है|

कार्यस्थल पर होनेवाली हिंसा हो या योग्यता होने के बावजूद बडी जिम्मेदारियोंसे वंचित रखना हो, कामकाजी महिलाओंको इसके कारण मानसिक तकलिफोंका सामना करना पडता है| उनको परिवारवालों से भी सहयोग नही मिलता| बचपनसेंही लडका लडकी मे भेदभाव करने की मानसिकता के कारण घर के मर्द और लडके घर मे हाथ बटाना निचले दर्जे का काम समझते है| कामकाजी महिलाओं पर दोनो तरफ से दबाव पड जाता है| उन्हे शारीरिक और मानसिक तकलीफें उठानी पडती है| गर्भवती महिलाओं के लिये अगर कामकाज की जगह पर अधिक सुविधाएँ हो और बच्चो की देखभाल के लिये सुविधाएँ हो तो काफी हद तक स्थितियोंमे सुधार हो जायेगा| परिवार के कारणही इन्सान की इंसानियत कायम रहती है ,परिवार के अभाव मे आदमी जंगली जानवर या मशीन की तरह बन जायेगा| जिसे किसी भी तरह की भावभावनाऐं नही होंगी| ऐसा समाज सभी के लिए किसी खतरे से कम नही है|

सभी प्रतिकूल परिस्थितीयोंका सामना करते हुए आज की लडकियां आगे बढ रही है| उनको खुला और सुरक्षित आसमान देना हम सब की जिम्मेवारी है|इसलिये अपने आसपास की सब लडकियां और औरतोंको सहकार्य,समझदारी और इंसानियत का हाथ दे| तभी यही सब कल का समाज और उसकी सुंदर रचना करने के लिये सक्षम बनेगी|














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