‘My World’ is a series of insights on gender issues by the people for the people

Anuradha Thakur is an artist with a difference.She not only create beautiful paintings but also brought change in lives of rural women, tribals and underprivileged children.



विश्वविख्यात चित्रकार अनुराधा ठाकुर

अनुराधा ठाकुर एक ऐसी भारतीय चित्रकार हैं जिनकी तूलिका और रंगरेखाओं के जादुई स्पर्श‌‌‌ ने भारतीय लोकजीवन के सारतत्व को उसकी संपूर्ण आत्मा और निर्मलता के साथ चित्रबध्द करके अपनी अलग पहचान बनाई है.उनके चित्रों में भारत के विभिन्न प्रांतों में बिखरी हुई आदिवासी जातियों-जनजातियों के जीवन और संस्कृति की झलक पाई जाती है. देश-विदेश में अनुराधाजी की स्वतंत्र रूप से तीस प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं.साथ ही चालीस ग्रुप शोज़ में भी वे सहभागी हुई हैं.भारत में पुणे, मुंबई, बेंगलोर, हैदराबाद, चेन्नई, अहमदाबाद,दिल्ली, गुजरात,चंदीगड,अम्रुतसर, हिमाचल, जयपूर,गोवा आदि शहरों में उनकी प्रदर्शनियों का सफल आयोजन किया गया है. कॅलिफोर्निया, पॅरिस, शिकागो,बोस्टन जैसे विदेशों में भी उनकी प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं , जहाँ दर्शकों ने उनकी कला को बहुत सराहा है.अर्जेंटिना तथा पॅरिस की स्तरीय पत्रिकाओं में अनुराधाजी पर विशेष आलेख प्रस्तुत किए गए हैं.'क्राय'के कैलेंडर तथा नोटबुक में भी अनुराधाजी के चित्रों को समाविष्ट किया गया है. CFM कंपनी ने सन् 2010 में एक कॅलेंडर बनाया था, जिसके बारह पन्नों पर देश विदेश के अलग-अलग बेहतरीन चित्रकारों के चित्र छपे थे.इसके पहले प्रुष्ठ -- जनवरी महीने के प्रुष्ठ-- पर अनुराधाजी का चित्र छापा गया था! विशेष गौरव की बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री-कार्यालय में अनुराधाजी के Ethnic Serendipty के एक चित्र को प्रतिष्ठापित किया गया है.

वे छोटे-बडे़ कई सम्मानों, पुरस्कारों से सम्मानित हैं.

परंतु विशेष उल्लेखनीय सम्मान हैं-----

.सी.व्ही. एम.राष्ट्रीय पुरस्कार- --

-EthnicSerendipity 25 ' चित्रमालिका के लिए 2015.

महिला एवं बालविकास मंत्रालय द्वारा

राष्ट्रीय पुरस्कार.2o16.

-1oo Women Achievers in India(Art and Culture)Award--2016.


अनुराधा ठाकुर का बचपन 'अहमदनगर' के पास के एक छोटे से गाँव-राहुरी--में बीता.स्कूल में थी,तभीसे उन्हें चित्रकला में विशेष रुचि थी,लगाव था. 1975 में अनुराधाजी ने पुणे स्थित 'अभिनव कला महाविद्यालय'

में दाख़िला ले लिया.आरंभिक वर्ष से ही उनके स्केचेस् अध्यापको की प्रशंसा के पात्र बने.अध्यापक अन्य विद्यार्थियों के स्केचेस पर टिकमार्क करते धे या रिमार्क लिख देते थे,परंतु अनुराधाजी के चित्र की पिछली तरफ सूचना या रिमार्क लिख देते थे ताकि चित्र का संतुलन न बिगड़े.अध्यापकों का विश्र्वास और प्रशंसा अनुराधाजी के कला-जीवन का संबल बन गए! महाविद्यालयीन शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें कुछ ऐसे प्रकल्पों पर काम करने का अवसर मिला,जिनके माध्यम से वे कला के साथ -साथ सामाजिक उपादेयता का दायित्व भी निभा पाईं. परिस्थिति में रहने वाले बच्चे और महिलाएँ हमेशा से अनुराधाजी की प्रेरणा रहे है.एक एन्.जी.ओ.के लिए काम करते समय उन्होंने एक स्कूल में आर्थिक स्तर पर पिछडे़ हुए बच्चों को अत्यल्प साधनों की सहायता से चित्रकला सिखाई.बच्चे तहज़ीब,तौर-तरीकों से अनजान थे--आसानी से ग़लत राह पर मुड़ सकते थे.पर अनुराधाजी की' कला -थेरपी' से बच्चों की वर्तन-समस्याएँ दूर हो गईं,उनमें बेहद सुधार आ गया.इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए उन्हें महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक अनुसंधान मंडल की तरफ़ से पुरस्कार प्रदान किया गया.

एक अन्य प्रकल्प में बीड ज़िले की पाचोड़ तहसील की एक संस्था महिलाओं को बोअरवेल-पंप ठीक करने का प्रशिक्षण देना चाहती थी.परंतु महिलाएँ काम सीखने से कतरा रही थीं.पुराने ज़माने में गाँवों में पानी के लिए बोअरपंप पर ही निर्भर रहना पड़ता था. अनुराधाजी ने अपनी मौलिक सूझबूझ से ऐसे चित्र बनाए जिनमें महिलाएँ पंप को ठीक करने का ,उसके रखरखाव का काम करती दिखाई गईं थीं. इसकेफलस्वरूप प्रकल्प को मंज़ूरी मिल गई,महिलाओं को प्रशिक्षण मिला.उनका मनोबल बढ़ाने,उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में कितना बडा सहयोग रहा अनुराधाजी के चित्रों का! इसी प्रकार डॉ.अभय बंग की 'सर्च' संस्था के लिए

अनुराधाजी ने कार्यशालाओं का आयोजन किया था.

छोटी छोटी बस्तियों के बच्चों को उन्होंने रंगोली बनाना, चित्र बनाना सिखाया. वहाँ के आदिवासी बच्चे

पुराने,फटे हुए कपड़े पहनते थे. अनुराधाजी ने उन्हें

माथे पर बड़े-बड़े रंगबिरंगे तिलक बनाना सिखाया,

कागज़ के गहने बना कर पहनना सिखाया.


अनुराधाजी के चित्रों का विषय/आशय--

उन्होंने आरंभ में भंडारदरा(अहमदनगर ज़िला )

के आसपास के परिवेश और बाद में कई अन्य राज्यों,

देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित आदिवासी जनजीवन को निकट से देखा-परखा. झाबुआ प्रांत,उत्तर-पूर्व

भारत के नागालँड, मणिपूर, मेघालय,असम, सिक्कीम राज्यों में निवास करके अनुराधाजी ने आदिवासी जनों की जीवनशैली,रूढ़ी-परंपरा,रीति-रस्मों को स्वयं देखा--अनुभव किया.अनुराधाजी ने गौर किया कि आदिवासियों का जीवन अत्यधिक अभावग्रस्त था, भौतिक सुविधाएँ नहीं थीं.उन्हें हर दिन जीविका चलाने के लिए अथक परिश्रम करने पड़ते थे .लकड़ियाँ तोडना,फल-शहद इकट्ठा करना,शिकार करना इ.उनके जीवन के रोज़ाना काम थे.फिर भी वे प्रक्रुति से लड़ते नहीं थे,बल्कि प्रक्रुति का हाथ थाम कर उसके साथ समायोजन करते ही पाए गए! आदिवासी समाज में रूढ़ि-परंपराओं का पालन निष्ठापूर्वक किया जाता है.चोरी,लड़कियों से छेड़खानी उनके समाज में वर्जित है.वे अपनी इच्छानुसार अपना साथी चुनते हैं तथा 'एकपत्नीव्रत' का पालन करते हैं.जो अपने पास नहीं है,उसके बारे में सोचते ही नहीं! लगभग सभी आदिवासी इलाकों में रात होने पर साज़ बज उठते हैं.न्रृत्य की लय-ताल पर सभी एकसाथ थिरकने लगते हैं.त्यौहार मनाते हैं.एकता से ऐसी अद्भुत शक्ति का निर्माण होता है जो अंतत: एक शांत लय में परिणत हो जाती है.

अनुराधाजी के चित्र देखते समय हम दर्शक भी आदिवासी जनों के सुख-दुख,न्रृत्य-गायन-वादन की

लय-ताल के साथ सहज सामंजस्य स्थापित करते हैं.

ये चित्र आदिवासियों की सच्चाई, ईमानदारी ,निष्ठाभाव

के साथ-साथ प्रक्रुति की ऊर्जा, उसकी गतिमानता को

उत्स्फूर्तता के साथ अभिव्यक्त करते हैं.चित्रों में दिखाई देने वाले लोग कभी दुखी अथवा नकारात्मक भावनाओं का संप्रेषण नहीं करते.अनुराधाजी ने उनकी उत्सवप्रियता , मुक्त जीवन-शैली, दैनंदिन जीवन,वहाँ का बाज़ार,चावल की खेती,उनकी चावल की खेती,उनकी झुग्गी-झोपड़ियाँ, ऋतुचक्र इ.को चित्रबध्द किया है.

अनुराधाजी के व्यक्तित्व की सबसे लक्षणीय बात

है उनकी सादगी, विनम्रता,कार्य के प्रति अपार निष्ठा

और सकारात्मकता! वे समझती हैं कि "काम छोटा

हो या बड़ा,यदि हम उसकी तरफ सकारात्मक

द्रुष्टि से देखें,उसे सच्चाई के साथ निभाएँ,तो उसे

समाज और विश्व की सराहना अवश्य मिलती है."

वे स्वयं इस बात का उत्क्रुष्ट उदाहरण हैं!!


आलेख--डॉ .विद्या सहस्त्रबुध्दे

अहमदनगर (महाराष्ट्र )

मोबाईल-9226228762




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